शुक्रवार, 26 सितंबर 2008

सड़क किस की है

ज़माने का नया दस्तूर देखिये बदल गए है लोगो के पहनावे और तोर--तरीके
फिर भी न जाने क्यूँ कुछ लोग अपनी ही दुनिया में रहते है ,सड़क को सड़क नही
कुश्ती का अखाडा समझते है , बात बीते सोमवार की है जब में करोल bagh मार्केट
में था और किसी काम से रोड क्रोस कर रहा था , मैंने देखा सामने से एक कार बहुत
तेज़ी से आ रही है , मैंने ख़ुद को संभाला और बच गया अब बात यहाँ कहा ख़तम होनी थी
वो कार सामने से आ रहे एक रिक्शा वाले से जा टकराई और उसका रिक्सा पलट गया
अब गलती देखी जाए तो कार में बैठे लड़के की थी , मगर वो टकराया रिक्सा से वाले से था तो इस लिए वो दोषी होकर भी दोषी नही बल्कि निर्दोष था , अब कार से निकलते ही उस लड़के ने और उसके दोस्त ने रिक्सा वाले पर जो हाथ-पाई और गालियों का भावः भंगिगम दृश्य पर्स्तुत किया उसे देखकर कुछ लोग तो खुस थे और मन ही मन ये चाह रहे थे की बेचारे रिक्सा वाले की गलती नही है फिर भी ये लोग उसे मार रहे है , वहां लोगो का हुजूम था लकिन किसी ने ख़ुद को इतना कष्ट नही दिया की वो उस निर्बल इंसान की मदद को आगे आए
और दुःख तो इस बात का था वो लोग पढ़े लिखे होकर बिल्कुल असभ्य इसान की तरह बात कर रहे थे , न तो वो किसी की सुन रहे थे और नही किसी को कुछ कहने दे रहे थे
उनमें से एक बोल रहा था , तुम लोगो को परमिट किसने दे दिया यहाँ रिक्क्सा चलाने का तुम्हारी वज़ह से ही हर शहर की आबादी बाद रही है तुम गरीब लोग पैदा ही क्यूँ होते है
जिन्दगी में तुम कुछ कर तो पाते नही हो जहा पैदा होते हो वही मर जाते हो
दो वक्त की रोटी तो तुमसे जुटा नही पाते और आ जाते हो बड़े शहर में भीड़ को और ज्यादा करने के लिए तुम लोग बोज हो ख़ुद पर और देश पर तुम्हे जीना का कोई हक नही है
इसके बाद दूसरा लड़का बोला में जो कह रहा हूँ वो बकवास समझ आ रही है या नही ये जो तुने नुकशान किया है न गाड़ी का तुझे देना होगा , जिस इंसान को १० रूपये के लिए १० किलोमीटर रिक्सा खीचना पड़ता हु वो बेचारा ५०० या १००० कहा से देगा
लोगो ने उन्हे खूब समझाया पर वो मानने को तेयार नही थे
इतने में से एक बुजुर्ग अंकल आए उनकी उमर ६० या ६५ के करीब थी उन्होंने पहले जानने की कोशिश की की माज़रा क्या है , फिर वो बोले बेटा आपका नाम क्या है एक ने कहा अंकल मेरा नाम सूरज है , और दुसरे ने कहा और मेरा आकाश अंकल बोले की आप दोनों के नाम इतने अच्छे है फिर आपको ये तो समझना चाहिए की आप लोग तो अपने नाम की तरह आलिशान घर में रहते हो और, आपकी गाड़ी भी कितनी बड़ी है अभी आपने ख़ुद से कुछ नही किया है तभी आपको ५०० रूपये बहुत लगते है और आप सोचते हो की ये रिक्सा वाला वो दे देगा लकिन बेटा ये गरीब रोज़ १० रूपये के लिए १० किलोमीटर रिक्शा खिचता है तो इस हिसाब से आप लोगो को इंतज़ार करना पड़ेगा जब ये ५० चक्कर पुरा कर लेगा तो आपको लौटा देगा आपके पैसे आप तब तक रुकोगे यहाँ ये बात सुनकर वो दोनों अजीब मुद्रा में सोचने लगे और बोलने लगे नही अंकल हमें बहुत काम है हम नै रुक सकते हमें पैसे नही चाहिए रहने दीजिये
इसके बाद अंकल ने कहा बेटा ये भीड़ गरीबो ने नही बल्कि इंसान की अविष्कारों ने बडाई है
पहले इंसान कम थे मोटर गाडिया नही थी लकिन इंसान ने अपनी सुविधा देखी और आज उसका नतीजा ये है इतनी भीड़ हो चुकी है आज हां इंसान कम और मोटर-गाडिया ज्यादा दिखाई देती है
अब इंसान गरीब होतो रिक्सा चलाकर पेट भरना चाहए तो लोग उसे ग़लत निगाहों से देखते है ये देश सबका है ये सड़क सबकी है , लकिन इंसान सबका नही है जो जैसा है ख़ुद को महान समझता है अब तुम लोग जब एक जगह निकलोगे तो टक्कर तो होगी
मेरा देश हिन्दुस्तान तरक्की तो जरुर कर रहा है लकिन यहाँ के बाशिंदों मेंं अपने नित-नये
अविष्कारों से लोगो में द्वेष भर रहा है ,
आज बात सड़क कि है , ये किसकी है , कल बात देश की होगी ये आमिरो का है या गरीबो का या फिर नाम वालो का और इसमें किसका कितना हिस्सा है

3 टिप्‍पणियां:

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत मार्मिक प्रसंग है।

सुमित प्रताप सिंह ने कहा…

एक सुझाव। इस रचना को पद्य की बजाय गद्य रूप में प्रस्तुत करें तो बढ़िया रहेगा।

vanitatomar ने कहा…

good rachna