शनिवार, 13 सितंबर 2008

एक परिंदा

(आज मेरा जन्मदिन है तो ये कविता मेरे माता-पिता और मेरे गुरु जी अशोक चक्रधर को समर्पित है)


आज के दिन एक परिंदा
आसमान से आया था
कुछ इस दुनिया को देने

कुछ इस दुनिया से लेने आया था
नाम उसका जयदेव रखा था

माता-पिता ने चाव से
बचपन से था बड़ा शांत वो

कुछ कहते थे दब्बू है
दुनिया से मिलना-जुलना

चिकनी-चुपडी बातें
कहाँ उसको आती थीं
किंतु था वो
अपनी धुन का पक्का
खोया रहा वो सपनो में
पलटा जो समय का पहिया तो

दुनिया ने उसकी सुध ली
आज कहे कोई कवि उसको

कोई शायर तो कोई
गीतकार कहता है
गुरु मिला है उसको
अशोक चक्रधर सा महान
जो हर पल उस पर

अपनी कृपा-दृष्टि धरता है
अब पलट गए हैं

दुनिया के चेहरे
और उनकी सोच भी

कल तक थे जो बेगाने
आज हंसकर मुझसे मिलते हैं
सब महिमा है ऊपर वाले की

उसने ही किया कमाल
मैंने तो चाहा बस इतना ही

दूर गगन की छाव में
किसी को देना सुख के मोती

किसी के दुःख को साझा करना
मैं कल भी वो ही था

आज मैं जो हूँ
पर न समझे जो नादान थे
मैं शब्दों का महारूप विकराल
जो आता है दिल में कह देता हूँ

मैं न सोचूँ आज और कल की
मैं मस्त परिंदा आसमान का

वर्षों पहले इस धरा पर आया था।




2 टिप्‍पणियां:

सुमित प्रताप सिंह ने कहा…

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनायें। भगवान् करे जयदेवरूपी यह परिंदा सौ वर्षों तक अपनी कविताओं से हम सबको पकाता रहे।

निधि शेखावत ने कहा…

mast parinde ki kavita mast hai.