शनिवार, 9 अगस्त 2008

बस

बस के सफर में

कुछ अजीब सा माहौल

हमसे पेश आया

लड़कियों को मैं भइया

और औरतो को मैं

भिखारी नज़र आया

बस थी भरी तो

इस में मेरा

कसूर क्या था

पुरूष तो थे

एक आध दर्ज़न

बाकी बस औरतों से भरी थी

जहा भी पैर रखा तो गाली

जो हिला तो थप्पड़

उन्हे मैं इकलौता इंसान

हाथ साफ़ करने का

tissue पेपर नज़र आया।

चलो खूबसूरत लड़कियों ने

मारा था तो अच्छा था

पर क्यूं बदसूरतों ने

अपना हाथ साफ़ किया

कुछ तो थीं उनमें

हिलती-दुलती चाचियाँ भी शामिल

जिनका चलना-फिरना ही

एक करिश्मा था

किस तरह तोडा उन्होंने

एक नादान से बच्चे को

जैसे वो सब कबाडी

और मैं उन्हें हाथ साफ़ करने का

tissue पेपर नज़र आया।

jaidev kumar jonwal

3 टिप्‍पणियां:

Sumit Pratap Singh ने कहा…

aapki bus yaatra ko padke bahut anand aaya.
shubhkaamnayen

jaidev jonwal ने कहा…

thanks dost how are u aapko bhi

Naveen Bhagat ने कहा…

Jaidev sir, mann karta hai ki ek car khareedne ki suggestion de doon, par phit aisi kavitaein kaun likhega??