लड़कियों के कॉलेज के बहार लड़को का एअरपोर्ट होता है
हर एक लड़की ऐरोप्लाने और लड़का पैसेंजर होता है
देखकर वो हर एक सुंदरी को मोहित हो जाता है
चल बेटा चढ़ ले इसमें , वो सोचकर हर्षाता है
मगर कभी-कभी प्लेन क्रेश भी हो जाया करते है
खुद को तो कुछ नही होता , बस पैसेंजर सिधार जाया करते है
मगर ये दिल कहा बाज़ आता है दिल लगाने से
कभी गोरी, कभी काली,लम्बी , छोटी, मोटी
जींस ,सुइट वाली
इसको कुछ फर्क नही पड़ता है
ये हर किसी पे मरता है
बस एक अदद गर्ल-फ्रेंड के लिए सुबह-से -शाम तक
लाखो लैंडिंग का शोर सुनता है
कोई है जेट ऐर्वाय्स, तो कोई किंग फिशेर है
एयर इंडिया , सहारा का भी बोलबाला है
हर मॉडल कुछ न कुछ खास नज़र आता है
और होती है , कुछ हमारी तरह मोहब्बत वाली
आँख मिलते ही हम-तुम का रिश्ता बना लेती है
कोई दाने-कोई बिन दाने के आ फसती है
अजीब है, ये मोहब्बत का चलन देखो यारो
ये चाहती है की , इन्हें भी कोई देखे
और इनके हुस्न का चर्चा हो ज़माने में
मगर कम्बखत दिमाग नही है इनमें
ये १०० करोर के भारत में
९९, करोर , ९९, लाख, ९९ हज़ार ,९९९
में से सिर्फ़ एक को ही चुनती है
हर किसी का ये भइया से संबोधन करती है
जरा सोचो जो हमने भी चलन, चलाया , बहिन का
फिर तो हर लड़की सुरख्सीत और ख़ुद से शर्मिंदा सी होगी
हर तरफ़ रोड पे, बस में, ऑफिस में, कॉलेज में , मोहल्ले में
ढेर सारे भाइयो का प्यार होगा
फिर कौन छेड़ेगा उन्हे , ज़रा सोचे वो ख़ुद ही
जब ज़माने में बिहीन -भाई एकता संसार होगा
वो छिदे हम छेड एह तभी तो बात बनती है
क्यूंकि एक नही दो से मिलकर जोड़ा होता है
----------------------------
जयदेव जोनवाल एक उभरते हुए युवा कवि हैं, जिनकी रचनाओं में उसी ताजगी का आभास होता है जो वास्तव में एक युवा कवि की रचनाओं में होना चाहिए। मेरी उन्हें ढेरों शुभकामनायें। जयदेव अच्छी रचनाओं का निर्माण करें और हिन्दी की निरंतर सेवा करते रहें। जय हिंद! जय हिन्दी! सुमित प्रताप सिंह (दिल्ली गान के रचयिता) हास्य कवि जयदेव जोनवाल सम्पर्क सूत्र -: 09250683519,8826725292
मंगलवार, 21 अक्टूबर 2008
गुरुवार, 9 अक्टूबर 2008
रावण मरा क्या
आज दशहरा है हर साल की तरह
आज भी रावण जलाया जायेगा
गली गुचो में , सड़क पर , मैदानों पर
हर तरफ़ पटाखों और आतिश बाजियों का
दोर चलेगा लोग झुमके नाचेंगे
और अपनी खुशिया का इजहार करेंगे
उस रावन के जलने पर जो की लकडियो
कागजो और न जाने कितने ताम झाम से बना है
सिर्फ़ और सिर्फ़ मनोरंजन के लिए उसका वजूद
बस कुछ पल के लिए है
लकिन लोग उसको जलता देख
इसी राहत महसूस करते है मानो उन्होंने
सच में असली रावण को जलता देखा है
जो बदी का पर्तीक था और उसे उसके कर्मो का फल मिला
मगर आपके और हमारे दिलो के अन्दर बसे रावन का क्या
जो ख़ुद कर्ज है , लालची है , दोखेबाज़ है , चालबाज़ है
सिर्फ़ अपनी सोचता है कभी किसी को फायदा तो नही पहुचाता
बस अपने नफे नुक्सान में उलझा रहता है
असली रावण वो नही था जिसने सीता का हरण किया था
फिर भी उस में सत्ये का वास था जो उसने सीता को
इतना समय तो दिया की जिसमें वो उसके दिल में समां सके
उसने उसपर कोई जोर जबरदस्ती या अपने सामर्थ्ये का पर्योग नही किया
तो रावण वो था या आज का इंसान है जिसमें हर दूसरा इंसान शामिल है
क्यूंकि उसमें अपना एहम पहले है की मुझे ख़ुद की सोचनी है अपनों की सोचनी है
हम रावन के रूप में रावन को नही जलाते बल्कि अपना डर जलाते है
की हम ख़ुद से डरे हुए है और अपने बच्चो के सामने झूठ पर्दाषित कर रहे है
ये दिखावा किस लिए जिस रावन को राम ने पर्णों के अन्तिम छनो में
दिल से लगा लिया हो तो उसका कद और वक्तित्व क्या रहा होगा
अब जरा सोचकर बताओ आप सब लोग की रावन वो था जो बरसो पहले अमर हो गया
या हम लोग है जो आज कलयुग में कलजुग का काल बने बैठे है
क्या सच में रावण मरा क्या ---------------------------------------------------------------
आज भी रावण जलाया जायेगा
गली गुचो में , सड़क पर , मैदानों पर
हर तरफ़ पटाखों और आतिश बाजियों का
दोर चलेगा लोग झुमके नाचेंगे
और अपनी खुशिया का इजहार करेंगे
उस रावन के जलने पर जो की लकडियो
कागजो और न जाने कितने ताम झाम से बना है
सिर्फ़ और सिर्फ़ मनोरंजन के लिए उसका वजूद
बस कुछ पल के लिए है
लकिन लोग उसको जलता देख
इसी राहत महसूस करते है मानो उन्होंने
सच में असली रावण को जलता देखा है
जो बदी का पर्तीक था और उसे उसके कर्मो का फल मिला
मगर आपके और हमारे दिलो के अन्दर बसे रावन का क्या
जो ख़ुद कर्ज है , लालची है , दोखेबाज़ है , चालबाज़ है
सिर्फ़ अपनी सोचता है कभी किसी को फायदा तो नही पहुचाता
बस अपने नफे नुक्सान में उलझा रहता है
असली रावण वो नही था जिसने सीता का हरण किया था
फिर भी उस में सत्ये का वास था जो उसने सीता को
इतना समय तो दिया की जिसमें वो उसके दिल में समां सके
उसने उसपर कोई जोर जबरदस्ती या अपने सामर्थ्ये का पर्योग नही किया
तो रावण वो था या आज का इंसान है जिसमें हर दूसरा इंसान शामिल है
क्यूंकि उसमें अपना एहम पहले है की मुझे ख़ुद की सोचनी है अपनों की सोचनी है
हम रावन के रूप में रावन को नही जलाते बल्कि अपना डर जलाते है
की हम ख़ुद से डरे हुए है और अपने बच्चो के सामने झूठ पर्दाषित कर रहे है
ये दिखावा किस लिए जिस रावन को राम ने पर्णों के अन्तिम छनो में
दिल से लगा लिया हो तो उसका कद और वक्तित्व क्या रहा होगा
अब जरा सोचकर बताओ आप सब लोग की रावन वो था जो बरसो पहले अमर हो गया
या हम लोग है जो आज कलयुग में कलजुग का काल बने बैठे है
क्या सच में रावण मरा क्या ---------------------------------------------------------------
सोमवार, 6 अक्टूबर 2008
ये सड़क
ये सड़क दूर तक जायेगी
कभी हिंदू के मन्दिर
तो कभी मुस्लिम की दरगाह
सिखो के गुरद्वारे
ईसाईयों के गिरजा
ये हर जगह बिना भेदभाव के भरमंड करती है
कभी इसको अच्छे लगते है मन्दिर के भजन
तो कभी दरगाह की अजान
सिखो की गुरबानी , ईसाईयों के प्राथनाएं
इन सब में एक सा मनोहर है
और एक सा संदेश की इश्वर एक है
बस उसके नाम अलग-अलग है
उसके लिए नीच-उच्च
धर्म-अधर्म जैसा कुछ नही है
उसके यहाँ हिंदू, मुस्लिम, सिख , ईसाई नही होता
वो बस एक इंसान होता है
जिसके लिए धर्म का होना जरुरी नही है
बल्कि चार तत्व की महानता है
पृथ्वी ,जल , आकाश, वायु और कुछ नही है
अगर कही भेद है तो मुझमें है , मैं सड़क हूँ
इंसान नही आप लोग तो जहाँ चाहएं जा सकते हो
वो कोई सा भी डर हो , मगर मेरे भाग्य में
ये सब नही लिखा
मैं तो बस हर चोखट पर आके दम तोड़ देती हूँ
वो चाहएं किसी भी धर्म की हो
ये मेरी मज़बूरी है , बाहर -बाहर से ही मैं
आप लोगो के कर्म-काण्ड सुन सकती हूँ
और मुझे ख़ुद पे खुसी होती है
की भगवान् ने मुझे सड़क बनाया
मैं आज़ाद हूँ मुझ पर किसी का हक नही है
जहा रहती हूँ , खुस रहती हूँ
पर आप सब इंसान हो
बंधन मेरी मज़बूरी है आपकी नही
क्यूँ आपके दिलो में ये तेरा, ये मेरा
आता है , मैं सबकी हूँ
और आप सब मेरे
बाटना है तो एक-दुसरे से प्यार बात हो
मुझे और मुझ जैसे बेजुबान , लाचार सम्पदाओ को नही
मुझे न तो कोई रो क पाया है
और नही में कही रुक पाउंगी
ये सड़क -------------------------------------------------------------
कभी हिंदू के मन्दिर
तो कभी मुस्लिम की दरगाह
सिखो के गुरद्वारे
ईसाईयों के गिरजा
ये हर जगह बिना भेदभाव के भरमंड करती है
कभी इसको अच्छे लगते है मन्दिर के भजन
तो कभी दरगाह की अजान
सिखो की गुरबानी , ईसाईयों के प्राथनाएं
इन सब में एक सा मनोहर है
और एक सा संदेश की इश्वर एक है
बस उसके नाम अलग-अलग है
उसके लिए नीच-उच्च
धर्म-अधर्म जैसा कुछ नही है
उसके यहाँ हिंदू, मुस्लिम, सिख , ईसाई नही होता
वो बस एक इंसान होता है
जिसके लिए धर्म का होना जरुरी नही है
बल्कि चार तत्व की महानता है
पृथ्वी ,जल , आकाश, वायु और कुछ नही है
अगर कही भेद है तो मुझमें है , मैं सड़क हूँ
इंसान नही आप लोग तो जहाँ चाहएं जा सकते हो
वो कोई सा भी डर हो , मगर मेरे भाग्य में
ये सब नही लिखा
मैं तो बस हर चोखट पर आके दम तोड़ देती हूँ
वो चाहएं किसी भी धर्म की हो
ये मेरी मज़बूरी है , बाहर -बाहर से ही मैं
आप लोगो के कर्म-काण्ड सुन सकती हूँ
और मुझे ख़ुद पे खुसी होती है
की भगवान् ने मुझे सड़क बनाया
मैं आज़ाद हूँ मुझ पर किसी का हक नही है
जहा रहती हूँ , खुस रहती हूँ
पर आप सब इंसान हो
बंधन मेरी मज़बूरी है आपकी नही
क्यूँ आपके दिलो में ये तेरा, ये मेरा
आता है , मैं सबकी हूँ
और आप सब मेरे
बाटना है तो एक-दुसरे से प्यार बात हो
मुझे और मुझ जैसे बेजुबान , लाचार सम्पदाओ को नही
मुझे न तो कोई रो क पाया है
और नही में कही रुक पाउंगी
ये सड़क -------------------------------------------------------------
मंगलवार, 30 सितंबर 2008
उम्मीद
मैं उम्मीद हर दिल में बसती हूँ
कही किसी के लिए पलभर की खुशिया बनकर
तो कही किसी के लिए तमाम उमर का इंतज़ार बनकर
मुझसे चाह रखने वाले न जाने कितने
और उनको चाहतो को पुरी करने वाली सिर्फ़ और सिर्फ़ में एक
में हमेशा से हर किसी के लिए जीती -मरती आई
जब किसी को खुशिया मिलती है तो में में उसके साथ झुमके नाचती -गाती हु
और जब किसी का दिल टूटता है ये किसी का कोई सपना पुरा नही होता
में उस पल न जाने कितने जन्मो मरती हूँ
आज मुझे कुछ समय मिला और मुझे समझने वाला तो उसके
जरिये में आप तक अपनी आवाज़ पंहुचा रही हूँ
हमेशा से कसूर मेरा नही रहा बल्कि मेरे काम के बीच वो लोग आ जाते है
जीने सिर्फ़ अपने से मतलब होता है , चाहें उसके बदले लोगे के सपने
टूटे तो टूट जाए , कोई मरे - तो मरे उन्हे किसी से कुछ नही लेना देना
एसा मेरे साथ एक बार नही कई बार हुआ
लकिन आप सब को कुछ याद नही होगा
बात उन दिनों की है जब हिन्दुस्तान एक था इसका बटवारा नही हुआ था
सब लोग मिलकर रहते थे
मगर तब भी कुछ लोग ने अपनी सोची और देश का भला चाहने वालो की बात दबा दी
उसके बाद दूसरा मौका तब आया १९८४ में उस वक्त मेरा देश तरक्की पर था
और जल्द ही विश्व का सबसे बड़ा राष्ट बन जाता
मगर वो हुआ जो कुछ लोग चाहतें थे
हमेशा से सिर्फ़ चंद लोगो की खातिर ही
मेरे हिन्दुस्तान का चेहरा बदलता रहा है
मेरी तो सिर्फ़ चलती थी १८५७ के ज़माने में
जब लोग एक हुआ करते थे
और उन्होंने एक आवाज़ में अंग्रेजो के ख़िलाफ़
विद्रोह का डंका बजा दिया और उन्हें ये देश छोड़कर जाना पड़ा
उस जामाने को बीते सदिया हो गई
आज तो मेरे देश में ही मेरा वजूद नही है
हर तरफ़ भरष्टाचार है ,लालाज़ है, असं-तोष है
लोग अपने लिए जी रहे है , चाहए उसके लिए उन्हें अपनों का ही लहू क्यूँ न बहाना पड़े
अब में ये सब देख कर थक गई हु, ख़ुद से हार चुकी हूँ
अब अगर कुछ हो सकता है और कुछ किया जा सकता है तो वो आप लोग को करना है
किसी को दोष नही देना , किसी को बुरा नही कहना , किसी से लड़ना नही
बस अपने -अपने दिल में झाक कर देखो
और ख़ुद से बाद करो और ये फ़ैसला लो की आज तक जो तुमने किया
उसमें कितना अपने देश के लिए था और कितना ख़ुद के लिए
आप लोगो को ख़ुद मेरी पीडा और दुःख समझ आ जायेगा की में इतनी दुखी क्यूँ हु
जो हुआ उसे स्वीकारने की हिम्मत रखो
तुम हिन्दुस्ता का दिल हो
तुम सब में बसती है
जावा हिन्दुस्ता की धड़कने
कही किसी के लिए पलभर की खुशिया बनकर
तो कही किसी के लिए तमाम उमर का इंतज़ार बनकर
मुझसे चाह रखने वाले न जाने कितने
और उनको चाहतो को पुरी करने वाली सिर्फ़ और सिर्फ़ में एक
में हमेशा से हर किसी के लिए जीती -मरती आई
जब किसी को खुशिया मिलती है तो में में उसके साथ झुमके नाचती -गाती हु
और जब किसी का दिल टूटता है ये किसी का कोई सपना पुरा नही होता
में उस पल न जाने कितने जन्मो मरती हूँ
आज मुझे कुछ समय मिला और मुझे समझने वाला तो उसके
जरिये में आप तक अपनी आवाज़ पंहुचा रही हूँ
हमेशा से कसूर मेरा नही रहा बल्कि मेरे काम के बीच वो लोग आ जाते है
जीने सिर्फ़ अपने से मतलब होता है , चाहें उसके बदले लोगे के सपने
टूटे तो टूट जाए , कोई मरे - तो मरे उन्हे किसी से कुछ नही लेना देना
एसा मेरे साथ एक बार नही कई बार हुआ
लकिन आप सब को कुछ याद नही होगा
बात उन दिनों की है जब हिन्दुस्तान एक था इसका बटवारा नही हुआ था
सब लोग मिलकर रहते थे
मगर तब भी कुछ लोग ने अपनी सोची और देश का भला चाहने वालो की बात दबा दी
उसके बाद दूसरा मौका तब आया १९८४ में उस वक्त मेरा देश तरक्की पर था
और जल्द ही विश्व का सबसे बड़ा राष्ट बन जाता
मगर वो हुआ जो कुछ लोग चाहतें थे
हमेशा से सिर्फ़ चंद लोगो की खातिर ही
मेरे हिन्दुस्तान का चेहरा बदलता रहा है
मेरी तो सिर्फ़ चलती थी १८५७ के ज़माने में
जब लोग एक हुआ करते थे
और उन्होंने एक आवाज़ में अंग्रेजो के ख़िलाफ़
विद्रोह का डंका बजा दिया और उन्हें ये देश छोड़कर जाना पड़ा
उस जामाने को बीते सदिया हो गई
आज तो मेरे देश में ही मेरा वजूद नही है
हर तरफ़ भरष्टाचार है ,लालाज़ है, असं-तोष है
लोग अपने लिए जी रहे है , चाहए उसके लिए उन्हें अपनों का ही लहू क्यूँ न बहाना पड़े
अब में ये सब देख कर थक गई हु, ख़ुद से हार चुकी हूँ
अब अगर कुछ हो सकता है और कुछ किया जा सकता है तो वो आप लोग को करना है
किसी को दोष नही देना , किसी को बुरा नही कहना , किसी से लड़ना नही
बस अपने -अपने दिल में झाक कर देखो
और ख़ुद से बाद करो और ये फ़ैसला लो की आज तक जो तुमने किया
उसमें कितना अपने देश के लिए था और कितना ख़ुद के लिए
आप लोगो को ख़ुद मेरी पीडा और दुःख समझ आ जायेगा की में इतनी दुखी क्यूँ हु
जो हुआ उसे स्वीकारने की हिम्मत रखो
तुम हिन्दुस्ता का दिल हो
तुम सब में बसती है
जावा हिन्दुस्ता की धड़कने
शुक्रवार, 26 सितंबर 2008
सड़क किस की है
ज़माने का नया दस्तूर देखिये बदल गए है लोगो के पहनावे और तोर--तरीके
फिर भी न जाने क्यूँ कुछ लोग अपनी ही दुनिया में रहते है ,सड़क को सड़क नही
कुश्ती का अखाडा समझते है , बात बीते सोमवार की है जब में करोल bagh मार्केट
में था और किसी काम से रोड क्रोस कर रहा था , मैंने देखा सामने से एक कार बहुत
तेज़ी से आ रही है , मैंने ख़ुद को संभाला और बच गया अब बात यहाँ कहा ख़तम होनी थी
वो कार सामने से आ रहे एक रिक्शा वाले से जा टकराई और उसका रिक्सा पलट गया
अब गलती देखी जाए तो कार में बैठे लड़के की थी , मगर वो टकराया रिक्सा से वाले से था तो इस लिए वो दोषी होकर भी दोषी नही बल्कि निर्दोष था , अब कार से निकलते ही उस लड़के ने और उसके दोस्त ने रिक्सा वाले पर जो हाथ-पाई और गालियों का भावः भंगिगम दृश्य पर्स्तुत किया उसे देखकर कुछ लोग तो खुस थे और मन ही मन ये चाह रहे थे की बेचारे रिक्सा वाले की गलती नही है फिर भी ये लोग उसे मार रहे है , वहां लोगो का हुजूम था लकिन किसी ने ख़ुद को इतना कष्ट नही दिया की वो उस निर्बल इंसान की मदद को आगे आए
और दुःख तो इस बात का था वो लोग पढ़े लिखे होकर बिल्कुल असभ्य इसान की तरह बात कर रहे थे , न तो वो किसी की सुन रहे थे और नही किसी को कुछ कहने दे रहे थे
उनमें से एक बोल रहा था , तुम लोगो को परमिट किसने दे दिया यहाँ रिक्क्सा चलाने का तुम्हारी वज़ह से ही हर शहर की आबादी बाद रही है तुम गरीब लोग पैदा ही क्यूँ होते है
जिन्दगी में तुम कुछ कर तो पाते नही हो जहा पैदा होते हो वही मर जाते हो
दो वक्त की रोटी तो तुमसे जुटा नही पाते और आ जाते हो बड़े शहर में भीड़ को और ज्यादा करने के लिए तुम लोग बोज हो ख़ुद पर और देश पर तुम्हे जीना का कोई हक नही है
इसके बाद दूसरा लड़का बोला में जो कह रहा हूँ वो बकवास समझ आ रही है या नही ये जो तुने नुकशान किया है न गाड़ी का तुझे देना होगा , जिस इंसान को १० रूपये के लिए १० किलोमीटर रिक्सा खीचना पड़ता हु वो बेचारा ५०० या १००० कहा से देगा
लोगो ने उन्हे खूब समझाया पर वो मानने को तेयार नही थे
इतने में से एक बुजुर्ग अंकल आए उनकी उमर ६० या ६५ के करीब थी उन्होंने पहले जानने की कोशिश की की माज़रा क्या है , फिर वो बोले बेटा आपका नाम क्या है एक ने कहा अंकल मेरा नाम सूरज है , और दुसरे ने कहा और मेरा आकाश अंकल बोले की आप दोनों के नाम इतने अच्छे है फिर आपको ये तो समझना चाहिए की आप लोग तो अपने नाम की तरह आलिशान घर में रहते हो और, आपकी गाड़ी भी कितनी बड़ी है अभी आपने ख़ुद से कुछ नही किया है तभी आपको ५०० रूपये बहुत लगते है और आप सोचते हो की ये रिक्सा वाला वो दे देगा लकिन बेटा ये गरीब रोज़ १० रूपये के लिए १० किलोमीटर रिक्शा खिचता है तो इस हिसाब से आप लोगो को इंतज़ार करना पड़ेगा जब ये ५० चक्कर पुरा कर लेगा तो आपको लौटा देगा आपके पैसे आप तब तक रुकोगे यहाँ ये बात सुनकर वो दोनों अजीब मुद्रा में सोचने लगे और बोलने लगे नही अंकल हमें बहुत काम है हम नै रुक सकते हमें पैसे नही चाहिए रहने दीजिये
इसके बाद अंकल ने कहा बेटा ये भीड़ गरीबो ने नही बल्कि इंसान की अविष्कारों ने बडाई है
पहले इंसान कम थे मोटर गाडिया नही थी लकिन इंसान ने अपनी सुविधा देखी और आज उसका नतीजा ये है इतनी भीड़ हो चुकी है आज हां इंसान कम और मोटर-गाडिया ज्यादा दिखाई देती है
अब इंसान गरीब होतो रिक्सा चलाकर पेट भरना चाहए तो लोग उसे ग़लत निगाहों से देखते है ये देश सबका है ये सड़क सबकी है , लकिन इंसान सबका नही है जो जैसा है ख़ुद को महान समझता है अब तुम लोग जब एक जगह निकलोगे तो टक्कर तो होगी
मेरा देश हिन्दुस्तान तरक्की तो जरुर कर रहा है लकिन यहाँ के बाशिंदों मेंं अपने नित-नये
अविष्कारों से लोगो में द्वेष भर रहा है , आज बात सड़क कि है , ये किसकी है , कल बात देश की होगी ये आमिरो का है या गरीबो का या फिर नाम वालो का और इसमें किसका कितना हिस्सा है
फिर भी न जाने क्यूँ कुछ लोग अपनी ही दुनिया में रहते है ,सड़क को सड़क नही
कुश्ती का अखाडा समझते है , बात बीते सोमवार की है जब में करोल bagh मार्केट
में था और किसी काम से रोड क्रोस कर रहा था , मैंने देखा सामने से एक कार बहुत
तेज़ी से आ रही है , मैंने ख़ुद को संभाला और बच गया अब बात यहाँ कहा ख़तम होनी थी
वो कार सामने से आ रहे एक रिक्शा वाले से जा टकराई और उसका रिक्सा पलट गया
अब गलती देखी जाए तो कार में बैठे लड़के की थी , मगर वो टकराया रिक्सा से वाले से था तो इस लिए वो दोषी होकर भी दोषी नही बल्कि निर्दोष था , अब कार से निकलते ही उस लड़के ने और उसके दोस्त ने रिक्सा वाले पर जो हाथ-पाई और गालियों का भावः भंगिगम दृश्य पर्स्तुत किया उसे देखकर कुछ लोग तो खुस थे और मन ही मन ये चाह रहे थे की बेचारे रिक्सा वाले की गलती नही है फिर भी ये लोग उसे मार रहे है , वहां लोगो का हुजूम था लकिन किसी ने ख़ुद को इतना कष्ट नही दिया की वो उस निर्बल इंसान की मदद को आगे आए
और दुःख तो इस बात का था वो लोग पढ़े लिखे होकर बिल्कुल असभ्य इसान की तरह बात कर रहे थे , न तो वो किसी की सुन रहे थे और नही किसी को कुछ कहने दे रहे थे
उनमें से एक बोल रहा था , तुम लोगो को परमिट किसने दे दिया यहाँ रिक्क्सा चलाने का तुम्हारी वज़ह से ही हर शहर की आबादी बाद रही है तुम गरीब लोग पैदा ही क्यूँ होते है
जिन्दगी में तुम कुछ कर तो पाते नही हो जहा पैदा होते हो वही मर जाते हो
दो वक्त की रोटी तो तुमसे जुटा नही पाते और आ जाते हो बड़े शहर में भीड़ को और ज्यादा करने के लिए तुम लोग बोज हो ख़ुद पर और देश पर तुम्हे जीना का कोई हक नही है
इसके बाद दूसरा लड़का बोला में जो कह रहा हूँ वो बकवास समझ आ रही है या नही ये जो तुने नुकशान किया है न गाड़ी का तुझे देना होगा , जिस इंसान को १० रूपये के लिए १० किलोमीटर रिक्सा खीचना पड़ता हु वो बेचारा ५०० या १००० कहा से देगा
लोगो ने उन्हे खूब समझाया पर वो मानने को तेयार नही थे
इतने में से एक बुजुर्ग अंकल आए उनकी उमर ६० या ६५ के करीब थी उन्होंने पहले जानने की कोशिश की की माज़रा क्या है , फिर वो बोले बेटा आपका नाम क्या है एक ने कहा अंकल मेरा नाम सूरज है , और दुसरे ने कहा और मेरा आकाश अंकल बोले की आप दोनों के नाम इतने अच्छे है फिर आपको ये तो समझना चाहिए की आप लोग तो अपने नाम की तरह आलिशान घर में रहते हो और, आपकी गाड़ी भी कितनी बड़ी है अभी आपने ख़ुद से कुछ नही किया है तभी आपको ५०० रूपये बहुत लगते है और आप सोचते हो की ये रिक्सा वाला वो दे देगा लकिन बेटा ये गरीब रोज़ १० रूपये के लिए १० किलोमीटर रिक्शा खिचता है तो इस हिसाब से आप लोगो को इंतज़ार करना पड़ेगा जब ये ५० चक्कर पुरा कर लेगा तो आपको लौटा देगा आपके पैसे आप तब तक रुकोगे यहाँ ये बात सुनकर वो दोनों अजीब मुद्रा में सोचने लगे और बोलने लगे नही अंकल हमें बहुत काम है हम नै रुक सकते हमें पैसे नही चाहिए रहने दीजिये
इसके बाद अंकल ने कहा बेटा ये भीड़ गरीबो ने नही बल्कि इंसान की अविष्कारों ने बडाई है
पहले इंसान कम थे मोटर गाडिया नही थी लकिन इंसान ने अपनी सुविधा देखी और आज उसका नतीजा ये है इतनी भीड़ हो चुकी है आज हां इंसान कम और मोटर-गाडिया ज्यादा दिखाई देती है
अब इंसान गरीब होतो रिक्सा चलाकर पेट भरना चाहए तो लोग उसे ग़लत निगाहों से देखते है ये देश सबका है ये सड़क सबकी है , लकिन इंसान सबका नही है जो जैसा है ख़ुद को महान समझता है अब तुम लोग जब एक जगह निकलोगे तो टक्कर तो होगी
मेरा देश हिन्दुस्तान तरक्की तो जरुर कर रहा है लकिन यहाँ के बाशिंदों मेंं अपने नित-नये
अविष्कारों से लोगो में द्वेष भर रहा है , आज बात सड़क कि है , ये किसकी है , कल बात देश की होगी ये आमिरो का है या गरीबो का या फिर नाम वालो का और इसमें किसका कितना हिस्सा है
मंगलवार, 23 सितंबर 2008
प्रेमी - प्रेमिका
अजीब सा रिश्ता है, ये प्यार का कही भी बन जाता है
कभी हो जाती है सेटिंग स्कूल में , तो कभी कॉलेज में
या अपने घर के सामने वाली खिड़की में
या फिर राह चलते या फिर सफर के सफर में
आज कल तो सेटिंग होने लगी है, मंदिरों में भी यारो
सजके आते है , आशिको के चच्चा , लैलाओ की नानी
घरवाले सोचते है की आज कल आस्तिक हो गया है बच्चा अपना
पर वो कही और ही गुल KHILATA है,, माँ वैष्णो देवी की जगह
पूजा वर्मा के चक्कर लगता है
लड़किया भी कुछ कम नही है आज के दोर में देखो
घर से निकलती तो ये kehkar की आज टूशन या सहेली के घर उसकी बर्थडे पार्टी है
मगर वो पार्को में और सिनेमा होल्लो में नन्हे आशिक बने फिरते है
चाहें ख़ुद की औकात नही हो चवन्नी की मगर गर्ल-फ्रेंड में पे वो हजारो रोज़ khrachte है
और लड़किया चुपके -चुपके सायानी हो चली है , खाया-पिया murgaa ही फसाती है
ख़ुद तो उसे रोजे खाती है और कभी कभी अपनी सहेलियों के लिए भी छोड़ जाया करती है
मोबाइल के चक्कर में प्यार सस्ता हो चला है , कट -कॉपी पेस्ट से दिल का हाल बाया होता है
जो न जानता हो शायरी का जुमला भी वो लाखो शेर मिनटों में अपनी प्रिये को फॉरवर्ड करता है
प्रेमी ने कहा
मेरी जान तू मेरा ईमान तू
तू इस कदर मुझ में समां गई है
में ख़ुद को तो अक्सर भूल जाता हु
मगर जब भी तू याद आती है
तुझसे मिलने को जुलाब सा मचलता है दिल
पेर्मिका ने कहा
मेरे महबूब , मेरे जानू
तू ही तू अब तो दिल में ujhlataaरहता है
ये तेरा नशा है , या फिर तेरी मोहब्बत है
आज कल तो मेरा अब्बू भी पूछता है मुझसे
बेटी ये तेरे मोबाइल पर किस कम्बखत का चेहरा है
प्रेमी ने कहा
तेरे अब्बू को तू बस इतना kehde
है ये मेरी जान कोई paraya nai है
अभी है ये मोबाइल पर,, कल अपने घर में होगा
उससे जो ukhadta है ukhaad ले वो
kyunki वो आशिक है मेरा , नही मिलती उससे उसकी सूरत
प्रेमिका ने कहा
मेरे आशिक मेरी मोहब्बत के rakhwale
मेरे अब्बू को प्यार अपना समझ नही आता है
तू leja mujhai घर से अपनी bana ले
kyunki मेरा बाप लगा है
तेरी talaash में tamam pagal khano में
प्रेमी ने कहा
tujhko chahna शायद भूल थी मेरी
तेरी खातिर में अपना sara बैंक balance uda baitha
अपने gharwalo और dosto में बदनाम हो गया हु
और tune भी khub nibhayi aashki मेरी
जो भी खाया पिया मेरे paiSO से
फ़ोन करता रहा TUJHKO में BARSO से
और तू है आज सुन लेती है की में PAGAL हु
तू JA और कही किसी और से अब ISHQ FARHMA
KYUNKI THIK ही कहा है BUJURGO ने
ये AASHIQI नही nibhti ladakpan में
ये नई -naveli fulljhadiyo से
कभी हो जाती है सेटिंग स्कूल में , तो कभी कॉलेज में
या अपने घर के सामने वाली खिड़की में
या फिर राह चलते या फिर सफर के सफर में
आज कल तो सेटिंग होने लगी है, मंदिरों में भी यारो
सजके आते है , आशिको के चच्चा , लैलाओ की नानी
घरवाले सोचते है की आज कल आस्तिक हो गया है बच्चा अपना
पर वो कही और ही गुल KHILATA है,, माँ वैष्णो देवी की जगह
पूजा वर्मा के चक्कर लगता है
लड़किया भी कुछ कम नही है आज के दोर में देखो
घर से निकलती तो ये kehkar की आज टूशन या सहेली के घर उसकी बर्थडे पार्टी है
मगर वो पार्को में और सिनेमा होल्लो में नन्हे आशिक बने फिरते है
चाहें ख़ुद की औकात नही हो चवन्नी की मगर गर्ल-फ्रेंड में पे वो हजारो रोज़ khrachte है
और लड़किया चुपके -चुपके सायानी हो चली है , खाया-पिया murgaa ही फसाती है
ख़ुद तो उसे रोजे खाती है और कभी कभी अपनी सहेलियों के लिए भी छोड़ जाया करती है
मोबाइल के चक्कर में प्यार सस्ता हो चला है , कट -कॉपी पेस्ट से दिल का हाल बाया होता है
जो न जानता हो शायरी का जुमला भी वो लाखो शेर मिनटों में अपनी प्रिये को फॉरवर्ड करता है
प्रेमी ने कहा
मेरी जान तू मेरा ईमान तू
तू इस कदर मुझ में समां गई है
में ख़ुद को तो अक्सर भूल जाता हु
मगर जब भी तू याद आती है
तुझसे मिलने को जुलाब सा मचलता है दिल
पेर्मिका ने कहा
मेरे महबूब , मेरे जानू
तू ही तू अब तो दिल में ujhlataaरहता है
ये तेरा नशा है , या फिर तेरी मोहब्बत है
आज कल तो मेरा अब्बू भी पूछता है मुझसे
बेटी ये तेरे मोबाइल पर किस कम्बखत का चेहरा है
प्रेमी ने कहा
तेरे अब्बू को तू बस इतना kehde
है ये मेरी जान कोई paraya nai है
अभी है ये मोबाइल पर,, कल अपने घर में होगा
उससे जो ukhadta है ukhaad ले वो
kyunki वो आशिक है मेरा , नही मिलती उससे उसकी सूरत
प्रेमिका ने कहा
मेरे आशिक मेरी मोहब्बत के rakhwale
मेरे अब्बू को प्यार अपना समझ नही आता है
तू leja mujhai घर से अपनी bana ले
kyunki मेरा बाप लगा है
तेरी talaash में tamam pagal khano में
प्रेमी ने कहा
tujhko chahna शायद भूल थी मेरी
तेरी खातिर में अपना sara बैंक balance uda baitha
अपने gharwalo और dosto में बदनाम हो गया हु
और tune भी khub nibhayi aashki मेरी
जो भी खाया पिया मेरे paiSO से
फ़ोन करता रहा TUJHKO में BARSO से
और तू है आज सुन लेती है की में PAGAL हु
तू JA और कही किसी और से अब ISHQ FARHMA
KYUNKI THIK ही कहा है BUJURGO ने
ये AASHIQI नही nibhti ladakpan में
ये नई -naveli fulljhadiyo से
शनिवार, 20 सितंबर 2008
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