शनिवार, 20 सितंबर 2008

गुरु जी द्वारा चेलों का सम्मान





राजू की शादी


चार बच्चो के परिवार में
राजू सबसे छोटा था
रमेश, सुरेश, सविता में
वो सबसे भोला था
उम्र से कुछ नादां और
कद में कुछ नाटा था
शायद भगवान् ने कुछ
ठीक नही किया था साथ उसके
परिवार में तो
था ही वो छोटा
कद में भी उसने कंजूसी कर दी
एक अच्छे खासे लड़के की
जग हसाई कर दी
कद ४" १ इंच , शरीर पतला
रंग साफ़ लड़का कम
गन्ना ज्यादा नज़र आता था
लोग देखकर उसको
कहकहें लगाते थे
अरे देखो ये
जनाब भी खूब है
हर चीज़ खुदा ने
तोल-मोल के दी है इनको
तभी तो न कद से
न sharir से
न उम्र से ये कुछ ज्यादा है
अरे ये इंसान कम
दूसरी दुनिया का अलिएन ज्यादा है
ये वक्त यु ही चलता रहा
बात शादी की
जब आई छोटे मिया की
तो हर लड़की देखकर
उनको आहे भरती थी
"है" भगवान् इस टाइप के
मॉडल भी बनाता है "
जो शकल और सरीर के
हुलिए से दुसरे मुल्क के नजर आते है
जो हुई शादी इससे तो में तो जीते जी मर जाउंगी
इस भरी दुनिया में हुकुम-ऐ-बोर्नविटा कहलाऊंगी
हर किसी ने सो बहाने बनाकर न कर दी
इस भरी दुनिया में कोई न मिला छोटू राजू को
हार कर बैठ गया था वो अपने गम के अफशाने में
तो कही से एक किरण आई बनके उसकी जिन्दगी में
अरे एक लड़की है कही दूर के
"रिश्ते" में देखने में मुझ जैसी ही है ,छोटी , पतली और मेल सरीका है दोनों का
एक सा हाल -ऐ- करिश्मा है
बात चलायी तो बात बन बैठी एक नाटे को एक नाटी मिल बैठी
जोड़ी कमाल लाखो में एक थे वो
हर कोई देखकर उनको दुआए दे रहा था
शादी के दिन एक चूहे और एक चुहिया का मेल हो रहा था
अब ठीक ही कहा है, ऊपर वाले ने हर किसी का दिन आता है
और हर किसी को कोई न कोई मिलता है
बड़ी धूम धाम से राजू का विवाह सम्पन हुआ
और उसको दुल्हन सुख नसीब हुआ
अब तो चिंता है "ये की "आगे क्या होगा
जब उनके बच्चे होंगे
क्या वो राजू या उसकी बीवी के जैसे होंगे
या कुछ नया ही पनपेगा इन दोनों के मिलने से
एसा नो हो कोई जन्मे विस्फोट नया
या हो वो "अलिएन" या हो कोई अनुबम्ब नया
जो bhi ho अजब raha राजू का जीवन सारा
जब हुआ पैदा तो माँ- बाप हेरा थे
आज जो की है शादी तो zamaane कों चिंता है उसकी
वो आज भी अजूबा है, बरसो पहले जो था।

शनिवार, 13 सितंबर 2008

एक परिंदा

(आज मेरा जन्मदिन है तो ये कविता मेरे माता-पिता और मेरे गुरु जी अशोक चक्रधर को समर्पित है)


आज के दिन एक परिंदा
आसमान से आया था
कुछ इस दुनिया को देने

कुछ इस दुनिया से लेने आया था
नाम उसका जयदेव रखा था

माता-पिता ने चाव से
बचपन से था बड़ा शांत वो

कुछ कहते थे दब्बू है
दुनिया से मिलना-जुलना

चिकनी-चुपडी बातें
कहाँ उसको आती थीं
किंतु था वो
अपनी धुन का पक्का
खोया रहा वो सपनो में
पलटा जो समय का पहिया तो

दुनिया ने उसकी सुध ली
आज कहे कोई कवि उसको

कोई शायर तो कोई
गीतकार कहता है
गुरु मिला है उसको
अशोक चक्रधर सा महान
जो हर पल उस पर

अपनी कृपा-दृष्टि धरता है
अब पलट गए हैं

दुनिया के चेहरे
और उनकी सोच भी

कल तक थे जो बेगाने
आज हंसकर मुझसे मिलते हैं
सब महिमा है ऊपर वाले की

उसने ही किया कमाल
मैंने तो चाहा बस इतना ही

दूर गगन की छाव में
किसी को देना सुख के मोती

किसी के दुःख को साझा करना
मैं कल भी वो ही था

आज मैं जो हूँ
पर न समझे जो नादान थे
मैं शब्दों का महारूप विकराल
जो आता है दिल में कह देता हूँ

मैं न सोचूँ आज और कल की
मैं मस्त परिंदा आसमान का

वर्षों पहले इस धरा पर आया था।




शुक्रवार, 12 सितंबर 2008

जूसी और सीसी


कवि जयदेव जोनवाल उर्फ़ जूसी अपने मित्र सीसी के साथ।

गुरुवार, 11 सितंबर 2008

गुरु और चेले


कवि जयदेव जोनवाल उर्फ़ जूसी अपने गुरु श्री अशोक चक्रधर व अपने मित्र सीसी के साथ।

सोमवार, 1 सितंबर 2008

कविता

कवि की कल्पना ओ से कविता जनम लेती है
बन जाती है , वो खुबसूरत , जो हो उसमें हुस्न और इश्क शामिल
रहती है , वो यादो में नया इतिहास रचती है

कवि -----------------------------------
कोई लड़की अगर देखो तो कविता उसमें दिखाई दे
चेहरे से चांदनी छलके , होठो से मय का समंदर
नैन काजल से काले हो , जुल्फों में सारा ज़माना
रहो तुम देखते उसको, वो हरपाल तुमको याद रहती है
कवि ---------------------------------------
जो लग जाए प्यार का चस्का तो कविता रंग बदलती है
बने पल में सब बेगाने, खुदा को वो भुला दे
ये ही है , दस्तूर मोहब्बत का ये दुनिया बदलती है

कवि ----------------------------------------------

न समझे कोई कवियों को करे बस तारीफ कविताओ की
कोई तो ये ज़रा कह दे , हम है तेरे
तेरा हम हाथ थामेंगे , रहेंगे बस हमेशा तेरे
तेरी ही कविताओ में समायेंगे , बनेगे शब्द हम तेरे
तेरी कलम जो कहती है

कवि ----------------------------------

ममता

माँ के मर्म से बड़ा कोई मोल नही है
जहा में माँ से बड़ा कोई और नही है
पैदा जो हुए तो दर्द इसने सहा, जो रोये कभी तो सिने से लगा दिया
नही उतर सकेंगे इसका क़र्ज़ हम , क्यूंकि ये हिसाब कुछ रुपयो का नही है
माँ --------------------------
चलना सीखाया इसने, ठोखरlलगी तो उठाया
तुतलाए जब भी हम , हमें बोलना सीखाया
ये पहला अध्याय अपना , ये पहली क्लास अपनी
ये गुरु हमारा , हमारी पहचान इससे इसकी पहचान हमसे नही है

माँ ----------------------------
जो हो गए बड़े हम तो क्यूँ इसे दुत्कारे
तोडे रिश्ता ख़ुद का इससे ,क्यूँ इसे bhulaye
कभी थी इसकी duniya हमसे
आज हमारी duniya में ये नही है
माँ -------------------------

जो मर गए हम तो faishla ऊपर bhagwan भी करेगा
jeenhone dukhaya होगा माँ का दिल unhai नरक में bharega
bhagwan ने बनाया , माँ को ख़ुद के rupe में
हर एक घर में इसका मन्दिर, ये माँ है murat तो नही है

माँ ---------------------------------------